दुल्हेंडी पर अनोखी परंपरा: 300 वर्षों से चढ़ाए जा रहे पंखे
झज्जर जिले में स्थित बाबा प्रसाद गिरी मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। होली के दूसरे दिन, जिसे दुल्हेंडी कहा जाता है, यहां एक अनोखी रस्म निभाई जाती है – पंखे चढ़ाने की परंपरा। यह परंपरा पिछले तीन सौ वर्षों से चली आ रही है, जिसमें श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में पंखे चढ़ाते हैं। पहले के समय में केवल हाथ से झलने वाले पंखे चढ़ाए जाते थे, लेकिन बदलते समय के साथ छत पंखे, कूलर और यहां तक कि एसी भी मंदिर में चढ़ाए जाने लगे हैं।
पंखों की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई?
करीब 300 वर्ष पहले, बाबा प्रसाद गिरी महाराज ने इसी दिन जीवित समाधि ली थी। मान्यता है कि बाबा को पंखे बहुत प्रिय थे, इसलिए उनकी समाधि के पास श्रद्धालु पंखे चढ़ाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। यह परंपरा तब से लेकर आज तक चली आ रही है और हर साल हजारों श्रद्धालु यहां आकर इस परंपरा को निभाते हैं।
मंदिर का गौरवशाली इतिहास
झज्जर का श्री श्री 1008 सिद्ध बाबा प्रसाद गिरी मंदिर लगभग 350 वर्षों पुराना है। इस मंदिर का नाम बाबा प्रसाद गिरी महाराज के नाम पर रखा गया है। बाबा के शिष्य श्रीमहंत धर्मराज गिरी महाराज ने यहां कई वर्षों तक सेवा की और उनकी प्रेरणा से यह परंपरा स्थापित हुई।
जीवित समाधि की रहस्यमयी कहानी
मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक और अद्भुत कथा बाबा प्रसाद गिरी महाराज की जीवित समाधि से जुड़ी है।
सेविका बिमला और बाबा का अटूट संबंध
बाबा की सेवा में एक बिमला नामक महिला रहती थी, जिसका पति फौज में सैनिक था। एक दिन, जब वह छुट्टी पर घर लौटा, तो कुछ पड़ोसियों ने उसे भड़काकर उसकी पत्नी पर बाबा प्रसाद गिरी महाराज के साथ अनुचित संबंधों का आरोप लगा दिया। इससे आहत होकर वह व्यक्ति गुस्से में आ गया और उसकी मृत्यु हो गई।
बाबा प्रसाद गिरी महाराज ने सैनिक को किया पुनर्जीवित
जब बिमला ने अपने पति की मौत की घटना बाबा को बताई, तो उन्होंने कहा कि उसकी शव यात्रा को मंदिर के सामने से लेकर जाओ। परिवार वाले पहले इस बात को नहीं माने, लेकिन बाद में उन्होंने बाबा की बात स्वीकार कर ली। जैसे ही शव मंदिर के सामने पहुंचा, बाबा ने चिमटे से जल छिड़का और अपने प्राणों का अंश मृत शरीर में डालकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। लेकिन इसके बाद बाबा स्वयं धरती में समा गए और जीवित समाधि ले ली। इस घटना के बाद से ही यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया।
सोमवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
चूंकि बाबा ने सोमवार के दिन समाधि ली थी, इसलिए हर सोमवार को यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। वे अपनी मनोकामना मांगते हैं और जब वह पूरी हो जाती है, तो दुल्हेंडी के दिन मंदिर में पंखे चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है।
पंखों की विविधता – अब कूलर और एसी भी चढ़ाए जाते हैं
पहले के समय में राजा-महाराजाओं के दरबारों में इस्तेमाल होने वाले हाथ के बड़े-बड़े पंखे यहां चढ़ाए जाते थे, लेकिन आज के आधुनिक दौर में छत पंखे, टेबल फैन, कूलर और यहां तक कि एसी भी श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जाते हैं। यह इस परंपरा की लोकप्रियता और भक्ति भावना का प्रमाण है।
संत सम्मेलन और भंडारे का आयोजन
हर साल 52 वर्षों से दुल्हेंडी के अवसर पर मंदिर में संत सम्मेलन और भंडारे का आयोजन किया जाता है। महंत परमानंद गिरी महाराज की अध्यक्षता में होने वाले इस आयोजन में देशभर के संत-महात्मा शामिल होते हैं और श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं।
होली पर्व पर नगर में प्रभात फेरी
होली के दौरान मंदिर से जुड़ी एक और प्रमुख परंपरा प्रभात फेरी की है। शहर में होली के दिन से प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं, जिनमें भजन-कीर्तन और धार्मिक गीतों के साथ श्रद्धालु शामिल होते हैं।
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दुल्हेंडी पर विशाल मेला
दुल्हेंडी के दिन मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। रंग-बिरंगे झूले, खान-पान के स्टॉल और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस मेले की खासियत होते हैं। मेले के अगले दिन सुबह हवन-यज्ञ और दो दिवसीय सत्संग का आयोजन किया जाता है। इन धार्मिक कार्यक्रमों के समापन के बाद विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं।
निष्कर्ष: आस्था, श्रद्धा और चमत्कारों का संगम
बाबा प्रसाद गिरी मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है, बल्कि आस्था और चमत्कारों का जीवंत प्रतीक भी है। 300 वर्षों से चली आ रही पंखे चढ़ाने की परंपरा, बाबा की जीवित समाधि की रहस्यमयी कथा और दुल्हेंडी पर विशाल आयोजन इसे एक अद्वितीय तीर्थ स्थल बनाते हैं।
हर साल हजारों श्रद्धालु यहां आकर अपनी मनोकामना मांगते हैं और पूरी होने पर पंखे चढ़ाकर अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। यदि आप भी किसी अद्भुत परंपरा और आस्था के केंद्र को देखना चाहते हैं, तो दुल्हेंडी पर बाबा प्रसाद गिरी मंदिर जरूर जाएं और इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनें।
