हरियाणा ईद हॉलिडे पर बड़ा यू-टर्न: छुट्टी रद्द, उर्स ए बाबा शाह कमाल में लाखों की भीड़, जानिए 7 बड़ी बातें

हरियाणा ईद हॉलिडे पर बड़ा यू-टर्न: छुट्टी रद्द, उर्स ए बाबा शाह कमाल में लाखों की भीड़, जानिए 7 बड़ी बातें
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हरियाणा सरकार ने रद्द की ईद-उल-फितर की छुट्टी, कर्मचारियों में मायूसी

हरियाणा सरकार ने ईद-उल-फितर पर घोषित की गई राजपत्रित अवकाश की अधिसूचना को वापस ले लिया है। पहले प्रदेश में 31 मार्च 2025, सोमवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया था, लेकिन दोपहर बाद सरकार ने अधिसूचना संशोधित कर इस छुट्टी को रद्द कर दिया। अब 31 मार्च को नॉर्मल वर्किंग डे रहेगा।

सरकार की नई अधिसूचना के मुताबिक, अब ईद-उल-फितर का अवकाश अनुसूची-2 में प्रतिबंधित अवकाश की श्रेणी में आ गया है। यानी जो कर्मचारी छुट्टी लेना चाहें, वे अपने स्तर पर Restricted Holiday (RH) का आवेदन कर सकते हैं।

अवकाश रद्द करने की वजहें: वित्तीय वर्ष का अंतिम दिन और वीकेंड पहले से ही छुट्टी

राज्य सरकार ने अवकाश रद्द करने के पीछे मुख्य वजह बताई कि 31 मार्च वित्त वर्ष 2024-25 का अंतिम दिन है। वहीं, 29 मार्च शनिवार और 30 मार्च रविवार पहले से ही छुट्टी है।
ऐसे में प्रदेश के वित्त, राजस्व, लेखा, खजाना और अन्य विभागों को वित्तीय कार्यों के निपटान के लिए खुले रहना जरूरी है। इसलिए सरकार ने अवकाश की अधिसूचना पर पुनर्विचार करते हुए इसे वापस ले लिया।

उर्स-ए-बाबा शाह कमाल: धार्मिक समरसता और सांस्कृतिक मेल का पर्व

हरियाणा के कैथल जिले स्थित जवाहर पार्क में बाबा शाह कमाल लाल दयाल की दरगाह पर तीन दिवसीय उर्स मेला शुरू हो चुका है। यह मेला हर वर्ष हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे की मिसाल बनकर उभरता है। इस बार भी देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दरगाह पर मत्था टेकने पहुंच रहे हैं।

बाबा शाह कमाल: बगदाद से कैथल तक का सफर

बाबा शाह कमाल कादरी का जन्म लगभग 550 साल पहले बगदाद में हुआ था। वे हजरत गौस पाक की 11वीं पीढ़ी से थे। उन्होंने भारत आकर बाबा लाल दयाल से मित्रता की।
उनकी दोस्ती इतनी प्रगाढ़ थी कि आज भी बाबा शाह कमाल और बाबा शीतलपुरी के बीच पगड़ी बदल भाई की परंपरा निभाई जाती है।

दरगाह की सेवा करते हैं हिंदू पुजारी

एक विशेष बात यह है कि इस दरगाह की देखभाल वर्षों से हिंदू पुजारी करते आ रहे हैं। बाबा कुलवंत शाह के निधन के बाद अब उनके पुत्र बाबा रजनीश शाह गद्दीनशीन के रूप में दरगाह की सेवा कर रहे हैं।
यह परंपरा दर्शाती है कि धर्म कोई दीवार नहीं, बल्कि सेतु है। यहां हर गुरुवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मन्नत मांगता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है।

उर्स मेले की भव्य शुरुआत: पहली चादर से जुड़ी अनूठी परंपरा

इस उर्स की शुरुआत बाबा शीतलपुरी के डेरे से आने वाली पहली चादर से होती है। यह चादर बाबा शाह कमाल और बाबा शीतलपुरी की अनंत मित्रता की प्रतीक है।
आज शाम पांच बजे यह पहली चादर दरगाह पहुंचेगी। इसके साथ ही मेले का विधिवत शुभारंभ हो जाएगा।

दरगाह परिसर रोशनी और फूलों से सजा

इस वर्ष भी दरगाह और पूरा पार्क रंग-बिरंगी लाइटों और फूलों से सजाया गया है। मुख्य द्वार से लेकर अंदर तक आकर्षक सजावट श्रद्धालुओं को खींच रही है।
सैंकड़ों स्वयंसेवक, बाबा शाह कमाल के भक्त राधे श्याम, नरेश दलाल एडवोकेट, नवीन गुगलानी, अशोक ठकराल, डॉ. गोपाल, मनोज गोयल, आशु कथूरिया सहित अन्य लोग तैयारियों में जुटे हैं।

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कव्वालों की महफिल: रूहानी गीतों से गूंजेगा आसमान

29 मार्च को रात 9 बजे से देश के प्रसिद्ध कव्वाल हमसर हैयात और उनके समूह बाबा की शान में कव्वालियां पेश करेंगे।
हर साल की तरह इस बार भी देशभर से आए कव्वाल बाबा शाह कमाल के गुणगान से माहौल को सूफियाना रंग देंगे।
कव्वाली के दीवाने इस पल का बेसब्री से इंतजार करते हैं क्योंकि बाबा की दरगाह पर गाए गए कलाम दिलों को सुकून और रूह को राहत देते हैं।

तीन दिन चलेगा विशाल भंडारा, कोई खाली हाथ नहीं लौटेगा

उर्स मेले के दौरान तीनों दिन विशाल भंडारे का आयोजन होगा। दोपहर 12 बजे से और शाम 7 बजे से भंडारा खुलेगा, जो बाबा की इच्छा तक जारी रहेगा।
हर जाति, धर्म और समुदाय के लोग एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करेंगे। यह दृश्य भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का सजीव उदाहरण बन जाता है।

बाबा रजनीश शाह ने किया भक्तों से आह्वान

गद्दीनशीन बाबा रजनीश शाह ने सभी भक्तों से उर्स मेले में पहुंचने और बाबा का आशीर्वाद लेने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा,
“बाबा शाह कमाल की दरगाह सभी धर्मों के लिए खुली है। यहां हर कोई आकर प्रेम, शांति और भाईचारे का संदेश लेकर जाता है।”

बाबा शाह कमाल उर्स: न सिर्फ मेला, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

यह उर्स न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि भारत में सांप्रदायिक सौहार्द और धार्मिक एकता की मिसाल भी है। बाबा शाह कमाल की दरगाह पर
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्मों के लोग एक साथ मत्था टेकते हैं। इस तरह की परंपराएं भारत की आत्मा हैं और हमें इनसे सीखने की जरूरत है।

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