सरकारी स्कूलों में सन्नाटा… बच्चे खाली बैठने को मजबूर… क्या जनगणना प्रशिक्षण ने बिगाड़ दी पढ़ाई की रफ्तार? जानिए करनाल के स्कूलों की जमीनी हकीकत।
करनाल। जनगणना प्रशिक्षण से स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होने का मामला अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ जहां पढ़ाई को गति मिलने की उम्मीद थी, वहीं करनाल जिले के सरकारी स्कूलों में हालात बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं। शिक्षक जहां जनगणना प्रशिक्षण में व्यस्त हैं, वहीं स्कूलों में छात्र खाली बैठकर समय बिताने को मजबूर हैं।
पिछले आठ दिनों में शिक्षा व्यवस्था जिस तरह प्रभावित हुई है, उसने अभिभावकों और शिक्षा विभाग दोनों की चिंता बढ़ा दी है। कक्षाओं में सन्नाटा है, ब्लैकबोर्ड खाली हैं और छात्र बिना पढ़ाई के दिन गुजार रहे हैं। यह स्थिति केवल एक-दो स्कूलों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे जिले के कई सरकारी स्कूलों में देखने को मिल रही है।
80% स्टाफ प्रशिक्षण में, स्कूलों में शिक्षक की भारी कमी
जानकारी के अनुसार, जनगणना कार्य के लिए शिक्षा विभाग का लगभग 80 प्रतिशत स्टाफ प्रशिक्षण में लगा दिया गया है। इसका सीधा असर स्कूलों में पढ़ाई पर पड़ा है। कई स्कूलों में आधे से ज्यादा शिक्षक अनुपस्थित हैं, जिससे नियमित कक्षाएं नहीं लग पा रही हैं।
शिक्षा विभाग के निर्देशों के अनुसार, जिन शिक्षकों की ड्यूटी जनगणना प्रशिक्षण में लगाई गई है, उनके लिए प्रशिक्षण में शामिल होना अनिवार्य है। यही वजह है कि स्कूलों में मौजूद सीमित शिक्षक पूरे सिस्टम को संभालने में असमर्थ नजर आ रहे हैं।
सुबह 9 से दोपहर 2 बजे तक प्रशिक्षण, पढ़ाई का समय प्रभावित
सबसे बड़ी समस्या यह है कि जनगणना प्रशिक्षण का समय सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक निर्धारित किया गया है, जो कि स्कूलों में पढ़ाई का मुख्य समय होता है। ऐसे में शिक्षक या तो प्रशिक्षण में जाते हैं या स्कूल में पढ़ाते हैं—दोनों कार्य एक साथ संभव नहीं हैं।
इसके अलावा, प्रशिक्षण में शामिल शिक्षकों को अन्य कोई कार्य करने की अनुमति भी नहीं है। इससे स्कूलों में वैकल्पिक व्यवस्था करना भी मुश्किल हो गया है।
कक्षाओं में सन्नाटा, छात्र कर रहे टाइमपास
स्कूलों में स्थिति यह है कि बच्चे कक्षाओं में बैठकर केवल समय काट रहे हैं। कई जगहों पर छात्र आपस में बातचीत करते या खेलते नजर आते हैं, लेकिन पढ़ाई का माहौल पूरी तरह खत्म हो चुका है।
अभिभावकों का कहना है कि नए सत्र की शुरुआत में ही इस तरह की स्थिति बच्चों के भविष्य के लिए चिंताजनक है। अगर जल्द ही हालात सामान्य नहीं हुए तो बच्चों की पढ़ाई पर लंबा असर पड़ सकता है।
जमीनी हकीकत: चार केस स्टडी
केस-1: 90% स्टाफ अनुपस्थित, कक्षाएं खाली
घराैंडा के देवी अहिल्या बाई होलकर राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में हालात बेहद खराब हैं। यहां 38 शिक्षकों में से 32 शिक्षक जनगणना प्रशिक्षण में व्यस्त हैं। यानी लगभग 90 प्रतिशत स्टाफ स्कूल में मौजूद नहीं है।
प्रिंसिपल परमजीत कौर के अनुसार, जो कुछ शिक्षक बचे हैं, वे भी 10वीं कक्षा की मार्किंग में लगे हुए हैं। ऐसे में स्कूल में पढ़ाई लगभग ठप हो चुकी है।
केस-2: एक शिक्षक संभाल रहा दो कक्षाएं
शेखपुरा मंचूरी गांव के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। यहां एक शिक्षक को दो-दो कक्षाएं संभालनी पड़ रही हैं।
प्रिंसिपल धर्मपाल ने बताया कि स्कूल के 19 शिक्षकों में से 8 शिक्षक प्रशिक्षण में लगे हुए हैं। इससे छात्रों की उपस्थिति भी प्रभावित हो रही है क्योंकि अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने में रुचि नहीं दिखा रहे।
केस-3: 19 में से केवल 3 शिक्षक उपलब्ध
निसिंग के नरू खेड़ी गांव में स्थिति और भी गंभीर है। यहां 19 शिक्षकों में से केवल 3 शिक्षक ही स्कूल में मौजूद हैं। बाकी सभी जनगणना कार्य में लगे हुए हैं।
प्रिंसिपल सुरेश कुमार के अनुसार, बचे हुए शिक्षक भी अन्य प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त हैं, जिससे पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है।
केस-4: अलग-अलग बैच में भी नहीं सुधर रही स्थिति
संगोहा के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकों को अलग-अलग बैच में बुलाया जा रहा है, लेकिन इससे भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो रहा।
प्रिंसिपल जगदीश ने बताया कि 35 शिक्षकों में से 16 शिक्षक पहले ही ड्यूटी दे चुके हैं और अब बाकी को बुलाया जा रहा है। इससे स्कूल में लगातार स्टाफ की कमी बनी हुई है।
प्रवेश अभियान पर भी असर
इस स्थिति का असर केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि नए सत्र के प्रवेश अभियान पर भी पड़ रहा है। स्कूलों में स्टाफ की कमी के कारण अभिभावकों को सही जानकारी नहीं मिल पा रही है।
कई अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला कराने के लिए स्कूल पहुंचते हैं, लेकिन वहां उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण वे वापस लौट जाते हैं। इससे नामांकन के आंकड़ों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
क्या बोले अधिकारी?
जिला शिक्षा अधिकारी रोहताश वर्मा ने स्पष्ट किया कि जनगणना प्रशिक्षण में जिन शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई है, उनका जाना अनिवार्य है।
उन्होंने कहा,
“जो शिक्षक स्कूल में बचे हैं, उन्हें ही कक्षाएं संभालनी पड़ेंगी। फिलहाल कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं है।”
शिक्षा बनाम प्रशासनिक कार्य: बड़ा सवाल
यह पूरा मामला एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या शिक्षा से जुड़े कर्मचारियों को प्रशासनिक कार्यों में इस तरह लगाना उचित है?
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और ऐसे कार्यों के लिए अलग से स्टाफ की व्यवस्था होनी चाहिए।
छात्रों पर मानसिक प्रभाव
लगातार खाली बैठने और पढ़ाई न होने से छात्रों पर मानसिक प्रभाव भी पड़ रहा है। बच्चों का पढ़ाई से ध्यान हट रहा है और उनकी सीखने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
आगे क्या?
अगर जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है। शिक्षा विभाग को इस दिशा में जल्द निर्णय लेने की जरूरत है ताकि पढ़ाई को पटरी पर लाया जा सके।
इस निर्णय का सामाजिक प्रभाव भी व्यापक होगा। इससे महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना बढ़ेगी और कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल बनाने में मदद मिलेगी।
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