103 दिन से जारी किसान आंदोलन: खनौरी बॉर्डर पर महिलाओं का हौसला, डल्लेवाल का आमरण अनशन और सरकार की चुप्पी

103 दिन से जारी किसान आंदोलन: खनौरी बॉर्डर पर महिलाओं का हौसला, डल्लेवाल का आमरण अनशन और सरकार की चुप्पी
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खनौरी बॉर्डर पर महिला किसानों की हुंकार: MSP की मांग को लेकर डटे आंदोलनकारी

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष पंचायत, महिलाओं ने बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा

हरियाणा और पंजाब के हजारों किसानों का धरना खनौरी बॉर्डर पर 103वें दिन भी जारी रहा। किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल का आमरण अनशन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस जवाब नहीं आया है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी देखने लायक रही।

शनिवार को खनौरी, शंभू और रतनपुरा बॉर्डर पर विशाल महिला किसान पंचायत का आयोजन किया गया, जिसमें हरियाणा और पंजाब की हजारों महिलाएं शामिल हुईं। इन महिला किसानों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी की मांग कर रही हैं और जब तक यह मांग पूरी नहीं होगी, आंदोलन जारी रहेगा।

103 दिन से जारी डल्लेवाल का आमरण अनशन: किसानों की जिद, सरकार की अनदेखी

खनौरी बॉर्डर पर किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल पिछले 103 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनकी सेहत लगातार बिगड़ रही है, लेकिन सरकार अब भी कोई समाधान निकालने को तैयार नहीं दिख रही।

किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ और काका सिंह कोटड़ा ने बताया कि डल्लेवाल ने अपनी मांगों को लेकर अडिग रहने का संकल्प लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार का यह रवैया किसान समुदाय के प्रति उसके असंवेदनशील रवैये को दर्शाता है।

“अगर सरकार को किसानों की चिंता होती, तो 103 दिन तक कोई आंदोलनकारी भूखा नहीं बैठा रहता,” किसान पंचायत में एक महिला किसान कमलेश ने कहा।

इतिहास में भी महिलाओं की भागीदारी रही अहम: ‘माई भागो’ की वीरता से मिली प्रेरणा

किसान आंदोलन में महिलाओं की भूमिका कोई नई नहीं है। जब दिल्ली किसान आंदोलन 13 महीने और 13 दिन तक चला, तब भी महिलाओं ने मोर्चा संभाला था। अब किसान आंदोलन-2 भी एक साल से अधिक समय से जारी है, और इसमें भी महिलाओं की भागीदारी जबरदस्त रही है।

महिला किसान पंचायत में वक्ताओं ने इतिहास की वीर महिलाओं का जिक्र करते हुए कहा कि जब युद्ध के मैदान में लड़ने की बात आई, तो माई भागो ने अपने वीरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी।

महिला किसान मायापति और मनीषा ने कहा कि आंदोलन सिर्फ पुरुषों का नहीं है, बल्कि महिलाओं की भागीदारी भी इसमें महत्वपूर्ण है। “किसी भी समाज के निर्माण में महिलाओं का योगदान सबसे ज्यादा होता है, और किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य होती है।”

महिला किसानों की चेतावनी: “हमारे सब्र का इम्तिहान न ले सरकार”

खनौरी बॉर्डर पर महिलाओं ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर MSP पर जल्द फैसला नहीं लिया गया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

किसान महिलाओं ने कहा, “हम सिर्फ खेती-बाड़ी संभालने के लिए नहीं बनीं, जरूरत पड़ने पर हम अपने हक के लिए सड़क पर भी उतर सकती हैं।”

महिला किसान पूजा, कमल, दर्शन और संतोष ने कहा कि सरकार की अनदेखी अब असहनीय होती जा रही है। वे चाहें तो इस आंदोलन को और लंबा खींच सकते हैं, लेकिन हम भी पीछे हटने वालों में से नहीं हैं।

दिल्ली आंदोलन की यादें ताजा, महिलाओं ने निभाई थी दोहरी जिम्मेदारी

जब दिल्ली में किसान आंदोलन 13 महीने और 13 दिन तक चला, तब महिलाओं ने दोहरी जिम्मेदारी निभाई थी – एक तरफ वे बॉर्डरों पर डटी रहीं और दूसरी ओर घर व खेत भी संभाले।

अब किसान आंदोलन-2 में भी यही देखने को मिल रहा है। कई महिलाएं अपने घरों और खेतों से समय निकालकर बॉर्डर पर डटी हुई हैं।

“हम लड़ाई के लिए तैयार हैं। किसान की बेटी, पत्नी और मां भी इस लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं,” महिला किसान केलो ने कहा।

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महिला किसान पंचायत में सरकार को खुला संदेश

महिला किसान पंचायत के दौरान सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की गई।

  • “हमें खाली वादे नहीं, कानून चाहिए!”
  • “हमारी मेहनत की सही कीमत मिलनी चाहिए!”
  • “जब तक MSP की गारंटी नहीं मिलेगी, आंदोलन जारी रहेगा!”

क्या सरकार झुकेगी? आगे की राह पर सबकी नजरें

अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार किसानों की MSP गारंटी की मांग मानेगी या फिर आंदोलन और तेज होगा?

डल्लेवाल के आमरण अनशन के 103 दिन पूरे हो चुके हैं और किसान अब निर्णायक संघर्ष के मूड में नजर आ रहे हैं।

कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली आंदोलन की तरह ही यह आंदोलन भी लंबा चल सकता है। अब देखना यह है कि सरकार कब तक चुप्पी साधे रखती है और क्या कोई समाधान निकलता है या नहीं।

निष्कर्ष

खनौरी बॉर्डर पर किसानों का संघर्ष जारी है, और इस संघर्ष में महिलाओं की भागीदारी ने इसे और मजबूती दी है। MSP की गारंटी की मांग को लेकर किसान डटे हुए हैं और आंदोलन का यह नया दौर सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

अब देखना यह है कि सरकार कब तक इस आंदोलन को अनदेखा करती है या फिर कोई ठोस समाधान निकलता है। आंदोलनकारी महिलाएं और किसान नेता साफ कर चुके हैं कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है।

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