“ऋषभ पंत चोट के बावजूद बैटिंग: जब टूटे अंगूठे से खेला शेर और जीत ली दुनिया”

"ऋषभ पंत चोट के बावजूद बैटिंग: जब टूटे अंगूठे से खेला शेर और जीत ली दुनिया"
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जब टूटे अंगूठे के बावजूद मैदान में उतरा ये भारतीय शेर: ऋषभ पंत ने फिर साबित किया, क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, जज्बा है

ऋषभ पंत चोट के बावजूद बैटिंग करते हुए मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड स्टेडियम में भारतीय क्रिकेट फैंस का दिल जीत ले गए। भारत और इंग्लैंड के बीच खेले जा रहे इस टेस्ट सीरीज के चौथे मुकाबले में जो हुआ, वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। पहली पारी में 37 रन बनाकर रिटायर्ड हर्ट हुए ऋषभ पंत ने दूसरे दिन एक पैर पर खड़े होकर फिर से मैदान में वापसी की और 54 रनों की जांबाज़ पारी खेली।

चोट के बावजूद हिम्मत नहीं हारी

पहले दिन जब तेज गेंदबाज क्रिस वोक्स की एक रिवर्स स्वीप पर गेंद सीधे ऋषभ पंत के दाएं पैर के अंगूठे पर जा लगी, तो कोई सोच भी नहीं सकता था कि वे अगले ही दिन मैदान पर वापसी करेंगे। लेकिन ऋषभ पंत के भीतर का योद्धा हार मानने को तैयार नहीं था। डॉक्टरों की सलाह के बावजूद उन्होंने अपने कप्तान और टीम को निराश नहीं किया।

वे न सिर्फ क्रीज पर टिके रहे, बल्कि तेज गेंदबाज जोफ्रा आर्चर की गेंद पर एक पैर से खड़े होकर जोरदार छक्का भी जड़ा। उनकी यह बहादुरी देखकर हर किसी को साल 2002 का वो लम्हा याद आ गया, जब अनिल कुंबले टूटे जबड़े के बावजूद गेंदबाजी करने उतरे थे।

जब अनिल कुंबले ने दिखाई थी मिसाल

2002 में एंटीगा टेस्ट में वेस्टइंडीज के खिलाफ बैटिंग करते समय मर्वन डिल्लन की गेंद से अनिल कुंबले का जबड़ा टूट गया था। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने 20 मिनट तक बल्लेबाजब अनिल कुंबले ने दिखाई थी मिसाल

2002 में एंटीगा टेस्ट में वेस्टइंडीज के खिलाफ बैटिंग करते समय मर्वन डिल्लन की गेंद से अनिल कुंबले का जबड़ा टूट गया था। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने 20 मिनट तक बल्लेबाजी की और फिर गेंदबाजी करने उतर गए। उन्होंने 14 ओवर फेंके और ब्रायन लारा जैसे दिग्गज बल्लेबाज को आउट किया। पट्टी बंधे चेहरे से गेंदबाजी करते हुए उनकी तस्वीरें आज भी क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में बसी हैं।जी की और फिर गेंदबाजी करने उतर गए। उन्होंने 14 ओवर फेंके और ब्रायन लारा जैसे दिग्गज बल्लेबाज को आउट किया। पट्टी बंधे चेहरे से गेंदबाजी करते हुए उनकी तस्वीरें आज भी क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में बसी हैं।

जब मैदान में ‘मार्शल लॉ’ चलाया गया

साल 1984 का इंग्लैंड दौरा वेस्टइंडीज के लिए यादगार रहा। लीड्स टेस्ट में मैल्कम मार्शल के बाएं अंगूठे में डबल फ्रैक्चर हो गया था, बावजूद इसके वो बल्लेबाजी करने उतरे। प्लास्टर लगे हाथ से बल्ला पकड़े उन्होंने चौका जड़ा और गोम्स को शतक पूरा करने में मदद की। फिर जब इंग्लैंड की दूसरी पारी शुरू हुई, तो उसी हाथ से गेंदबाजी कर 7 विकेट झटक लिए। ये सिर्फ गेंदबाजी नहीं थी, ये ‘मार्शल लॉ’ था।

क्रिकेट सिर्फ ताकत नहीं, आत्मा है

क्रिकेट के इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब खिलाड़ियों ने गंभीर चोटों के बावजूद मैदान नहीं छोड़ा। चाहे वो 2003 में गैरी कर्स्टन हों या 2009 में ग्रीम स्मिथ। आइए नजर डालते हैं कुछ ऐसे ही जज्बों पर:

कुछ और यादगार पल

1. गैरी कर्स्टन (2003, पाकिस्तान दौरा)

नाक टूटी, मैदान छोड़ा, लेकिन दूसरी पारी में जब टीम संकट में थी तो वापस लौटे और 46 रन बनाए।

2. ग्रीम स्मिथ (2009, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ)

बाएं हाथ की हड्डी टूटने के बावजूद आखिरी बल्लेबाज बनकर मैदान में उतरे और 17 गेंदें खेलीं।

3. बर्ट सटक्लिफ (1953, साउथ अफ्रीका के खिलाफ)

कान की लोब फटी थी लेकिन सिर पर पट्टी बांधकर उतरे और नाबाद 80 रन बनाए।

4. कॉलिन काउड्रे (1963, वेस्टइंडीज के खिलाफ)

प्लास्टर लगे हाथ से क्रीज पर आए, इंग्लैंड को जीत नहीं दिला सके लेकिन दिल ज़रूर जीत लिया।

5. रिक मैककॉस्कर (1977, ऑस्ट्रेलिया vs इंग्लैंड)

बॉब विलिस की बाउंसर से जबड़ा टूटा, लेकिन फिर भी दूसरी पारी में 25 रन बनाए और मैच जिता दिया।

क्या सीख देता है ये जज़्बा?

ऋषभ पंत हों या अनिल कुंबले, मैल्कम मार्शल हों या ग्रीम स्मिथ — इन खिलाड़ियों ने दुनिया को ये दिखाया कि क्रिकेट सिर्फ बल्ला और गेंद का खेल नहीं, बल्कि समर्पण, सहनशीलता और राष्ट्रप्रेम का मैदान है।

इन क्षणों में खिलाड़ी न केवल स्कोरबोर्ड बदलते हैं, बल्कि इतिहास लिखते हैं। जब भी कोई युवा खिलाड़ी मैदान में उतरता है, इन कहानियों को याद करता है तो उसे सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि ज़िंदगी खेलने की प्रेरणा मिलती है।

क्यों खास है ऋषभ पंत की वापसी?

  • क्रिकेट से करीब 14 महीने बाहर रहने के बाद पंत की ये वापसी थी।
  • चोट से उबरने के बाद उनका ये प्रदर्शन भारत को टेस्ट सीरीज में लीड दिला सकता है।
  • उन्होंने न केवल दर्द सहा, बल्कि देश के लिए खड़े होने का साहस दिखाया।

निष्कर्ष

ऋषभ पंत की ये पारी आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ बैटिंग की नहीं, हिम्मत की क्लासिक मिसाल बनकर याद रहेगी। खेल का असली रोमांच तो इसी में है कि जब शरीर जवाब दे जाए, तब आत्मा खेले।

आज ऋषभ पंत की यह तस्वीर, जिसमें वो एक पैर पर खड़े होकर छक्का लगा रहे हैं — आने वाले समय में उसी तरह याद की जाएगी जैसे अनिल कुंबले की पट्टी लगी हुई तस्वीर या मार्शल का प्लास्टर वाला हाथ।

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