रिपोर्टर: संजय शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार (20 वर्षों का अनुभव)
जैसलमेर — कश्मीर के खूबसूरत पहलगाम में हुआ आतंकी हमला अब भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में गहरा तनाव पैदा कर चुका है। लेकिन इस राजनीतिक तनाव की सबसे बड़ी कीमत उन निर्दोष लोगों को चुकानी पड़ रही है, जो सिर्फ मोहब्बत और रिश्तों को संजोना चाहते थे। जैसलमेर में बीते 13 दिन से रह रही दो पाकिस्तानी दुल्हनें, सचुल और करमा खातून, अब केंद्र सरकार के निर्देशों के चलते मजबूरन पाकिस्तान लौटने को विवश हैं। उनके हाथों की मेहंदी भी अभी फीकी नहीं पड़ी थी, कि विदाई का फरमान मिल गया।
आतंकवाद ने फिर छीनी खुशियां
22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले ने केवल सुरक्षा व्यवस्था को ही नहीं, बल्कि दो परिवारों के सपनों को भी चकनाचूर कर दिया। भारत सरकार ने हमले के बाद सख्त कदम उठाते हुए सभी पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द करने और तत्काल देश छोड़ने के आदेश जारी किए। इसी आदेश के तहत जैसलमेर में आईं सचुल और करमा खातून को भी वापस भेजा जा रहा है।
मोहब्बत की दास्तान, जो अधूरी रह गई
साल 2023 की बात है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के घोटकी इलाके में सालेह मोहम्मद और मुश्ताक अली अपने रिश्तेदारों से मिलने गए थे। वहीं उनकी मुलाकात 21 वर्षीय करमा खातून और 22 वर्षीय सचुल से हुई। ये मुलाकात जल्द ही प्यार में बदल गई। परिवारों की रजामंदी से अगस्त 2023 में दोनों जोड़ियों का निकाह संपन्न हुआ। लेकिन निकाह के बाद भी एक बड़ी मुश्किल सामने थी — भारत का वीजा नहीं मिल रहा था।
करीब डेढ़ साल का लंबा इंतजार इन प्रेम कहानियों के बीच दीवार बना रहा। अंततः अप्रैल 2025 में वीजा जारी हुआ और 11 अप्रैल को दोनों दुल्हनें अपने पतियों के साथ ससुराल जैसलमेर आ पहुंचीं। पूरे परिवार में खुशियों का माहौल था। लेकिन किसे पता था कि यह खुशी महज 13 दिनों की मेहमान होगी?
सरकार के आदेश से टूटा सपनों का संसार
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सभी पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द कर दिए। जैसलमेर के स्थानीय प्रशासन ने सचुल और करमा खातून के परिवारों को सूचित कर दिया कि दोनों को 27 अप्रैल तक हर हाल में पाकिस्तान लौटना होगा।
सचुल और करमा खातून की आंखों में आंसू थे। उनके शब्दों में दर्द था, “हम अपने परिवारों को छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाना चाहतीं। हमने प्यार किया है, शादी की है, कोई गुनाह नहीं किया।”
करमा खातून की मजबूरी
करमा खातून के हालात और भी दर्दनाक हैं। उनकी मां का देहांत पहले ही हो चुका है और उनके पिता आजीविका के लिए अरब देशों में मजदूरी कर रहे हैं। करमा के ससुर हाजी अब्दुल्ला का कहना है, “करमा का पाकिस्तान में कोई सहारा नहीं है। ऐसे में उसे लौटने के लिए मजबूर करना इंसानियत के खिलाफ है।”
उन्होंने यह भी बताया कि दुल्हनों के भारत पहुंचने के तत्काल बाद लॉन्ग टर्म वीजा (LTV) के लिए आवेदन कर दिया गया था। लेकिन आतंकी हमले के बाद सरकार के सख्त निर्देशों के चलते स्थानीय प्रशासन उन पर जबरन दबाव बना रहा है।
परिवारों का दर्द
दुल्हनों के जबरन पाकिस्तान भेजे जाने की खबर ने सिर्फ बेटियों को नहीं, उनके पतियों को भी तोड़ दिया। मुश्ताक अली की तबीयत खबर सुनते ही बिगड़ गई और उन्हें जोधपुर के एक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
परिवार ने भारत सरकार से भावुक अपील करते हुए कहा, “इंसानियत के नाते हमारी बेटियों को यहीं बसने दिया जाए। हमारा परिवार उजड़ जाएगा।”
कानूनी पहलू और प्रशासनिक स्थिति
जैसलमेर के विदेशी पंजीयन अधिकारी विक्रम सिंह भाटी ने जानकारी दी कि अब तक चार पाकिस्तानी नागरिकों ने अटारी बॉर्डर के जरिए लौटने के लिए अनुमति ले ली है। इनमें सचुल और करमा खातून भी शामिल हैं।
भाटी ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देशानुसार सभी पाकिस्तानी नागरिकों को 27 अप्रैल तक हर हाल में देश छोड़ना अनिवार्य है। इसके तहत प्रशासन तेजी से कार्रवाई कर रहा है।
रिश्तों पर सियासत का साया
यह घटना एक बार फिर यह दिखाती है कि किस तरह आतंकवाद और अंतरराष्ट्रीय राजनीति आम इंसान के जीवन में भूचाल ला देती है। ससुराल आई नई दुल्हनों के सपने, उनकी उम्मीदें और एक नए जीवन की शुरुआत आतंकवाद के शिकार हो गई।
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से रिश्तों में तल्खी रही है। जब भी कोई आतंकी घटना होती है, इसका सबसे पहला असर आम लोगों पर पड़ता है। इस बार भी वही हुआ — दो परिवारों के सपने उजड़ गए।
सामाजिक और मानवाधिकार सवाल
ऐसे मामलों में एक बड़ा सवाल मानवाधिकारों को लेकर भी उठता है। क्या सिर्फ राष्ट्रीयता के आधार पर दो नवविवाहिताओं को उनके परिवार से जुदा करना उचित है? क्या आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में निर्दोष नागरिकों को बलि का बकरा बनाना इंसाफ है?
क्या कोई समाधान संभव है?
कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार को मामले-दर-मामले आधार पर निर्णय लेना चाहिए, खासकर तब जब कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक से शादी कर चुका हो और स्थायी रूप से भारत में बसना चाहता हो।
परंतु मौजूदा हालात में सरकार की प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा है, और इसी कारण आम नागरिकों को भी कठोर निर्णयों का शिकार बनना पड़ रहा है।
निष्कर्ष
करमा खातून और सचुल की कहानी एक बार फिर साबित करती है कि युद्ध, आतंकवाद और राजनीति की सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं। ये दुल्हनें ना तो किसी अपराध में लिप्त थीं, ना ही किसी साजिश का हिस्सा। उनका दोष बस इतना था कि उन्होंने सरहदों से परे जाकर प्यार किया था।
जैसे ही 27 अप्रैल की तारीख नजदीक आती जा रही है, जैसलमेर में दोनों परिवारों के दिलों में एक ही सवाल गूंज रहा है — क्या इंसानियत की कोई जगह रह गई है?
